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दूरियां पहले से थीं

 विश्वास है मुझे  सब ठीक हो जायेगा      नहीं रहता    एक जैसा समय    दूर हो जायेगा     यह संक्रमण भी   ‌‌  खेल चलता रहता है   पतझड़ और बसंत दोनों का     नहीं बुझता है     आंवा विधाता का  घबराने की जरूरत नहीं इससे   ज़रूरत है तो बस   संयम बरतने की  पहले से ही कत्ल      होते आया है     सामाजिक दूरियों का  नई बात नहीं है यह कोई        केवल    इल्ज़ाम की चादर        ओढ़ ली है    कोरोना ने अपने ऊपर   बगीचे में ज़िंदगी के  यदि फूल खिलते हैं  तो मुरझाते भी हैं  जीवन और मृत्यु दोनों  साथ-साथ चलते हैं  साथ-साथ दौड़ते हैं  कोई इस दौड़ में दूर तक दौड़ता है कोई थक कर चूर हो जाता है  जहां थकावट हैं वहीं मृत्यु है जहां रुकावट नहीं है,     वहां जीवन है‌  मृत्यु के गर्भ में जीवन पलता है    दुःखी वही होता है   किसी...

पिता ही मेरे गुरु हैं

पिता ही मेरे गुरु हैं  गढ़ा है मुझे उन्होंने  तराशा है उस अनगढ़     पत्थर की तरह  जो बोल उठता है समय पर  गाने लगता है अपनी गाथा   बताता है अपनी व्यथा   कितनी मार सही है   यहां तक पहुंचने में    जंगलों की  खोह से निकालकर               उस देवालय तक   पहुंचाया है जिसने वह शिल्पकार मेरे पिता हैं इसका भी लंबा एक इतिहास है  वर्षों चलाई हैं छेनियां मुझ पर   कई रूपों में ढाला है   विवेक के महीन चलनी में      मुझे चाला है     ठोका है, ठठाया है  साधना की गर्म भट्टी में तपाया है  अपने मन के अनुरूप बनाया है   तब जाकर मिला है   एक नया आकार  नहीं पड़ा रहता बेकार     मिटा देता शिनाख़्त     अपने होने का  टकराती रहती भेड़ बकरियां      जंगलों से गुजरने वाली  व्यर्थ चला जाता यह जीवन  बिलीन हो जाता है पानी के      बुलबुले सदृश इस स...

गुरु पूर्णिमा

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।। कबीर

आते रहते हैं

नहीं होना चाहिए विचलित आते रहते हैं सुख-दु:ख समभाव में जीना चाहिए   अहंकार की रस्सियां  जल जाती हैं एक दिन  जलाया जाता है रावण  दशहरे के दिन अभी भी       बचा है रावण  अभी भी हमारे भीतर   मुक्त हो जायेगा रावण भी उस दिन सदा-सदा के लिए    जब झड़ जायेगा  पूंछ की तरह हमारा दर्प भी   बढ़ जाते हैं नाखून  काटने पर अब भी क्योंकि अभी भी बची हुई हैं   पाशविक प्रवृत्तियां हमारे भीतर  रह- रह मारती ही रहती हैं डंक  मिथ्या प्रर्दशन केवल जलाता है | अभिमान की रोटियां  वंचित कर देता है   वर्तमान सुखों से भी  बचना चाहिए इससे     करना चाहिए  चिंतन- मनन हमें  आता है दुःख भयावह रूप में   मिटा देता है शिनाख़्त  कुछ नहीं बचता है शेष  धारण रखना चाहिए धैर्य   ईश्वर साथ रहता है  अनवरत हम सभी के  भूल जाते हैं सुखों में उसे  पानी पर खींचा हुआ  लकीर है सुख केवल  वहम पाले हुए हैं अनावश्यक    नहीं रह जायेगा...

बचाती है विध्वंस से

बचाती है विध्वंस से  सृजनात्मकता सबको रचती है एक नई दुनिया   जहां फ़र्क की भट्ठी में  झोंकने से बचाया जा सकता है  अमीरी और ग़रीबी को    ऊपर उठ जाता है  इसको आत्मसात कर आदमी  चावल खाकर मुट्ठी भर  दरिद्रता दूर कर देता है      सुदामा का  धर्म निभाता है मित्रता का शक्ति होती है सृजनशीलता में  सदैव बचाती है विध्वंस से हमें  कभी ढकेलती नहीं है    रौरव नरक में    जीवन तलाशता है   निर्माण में ही नहीं मन में भाव आता है  घोंसले को नष्ट करने का  मुक्त हो जाता है सारे बंधनों से  जल जाती है दर्प की रस्सियां  उस सृजनात्मकता की आंच में    भूमिका निभाता है     एक कुशल शिल्पी की      गढ़ने लगता है   अनगढ़ पत्थरों को   प्राण फूंक देता है उसमें    एक नव जीवन का     कोमल स्पर्श से  उद्धार हो जाता है अहिल्या का  अर्थ मिल जाता है जीवन का  अंतर समझने लगती है       वह देवी...

आत्महत्या

व्यक्ति अंधा हो जाता है आकाश को छूने की होड़ में प्रतिस्पर्धी हो जाता है भेद नहीं कर पाता है अक्सर ऐसा होता है सही ग़लत के निर्णय में ग्लैमर की दुनिया की चकाचौंध में स्वप्न बिखर जाते हैं  कई अभिनेताओं के कई के टूट जाते हैं आत्मीयता नहीं होती है क्योंकि वहां कोई अपना नहीं होता है कोई हमदर्द नहीं होता किसी का कोई वहां       कामयाबी का स्वर सुनने के लिए गलाकाट प्रतियोगिता में   लाश पर चढ़कर किसी के  प्रतिभाग करना वहां की संस्कृति है कोई मर रहा है वहां या जी रहा है सुखी है या दुखी है किसी में नहीं है यह जानने की फ़ुर्सत अवसादग्रस्तता की तरफ़ ले जाती है यह स्थिति और अवसादग्रस्तता  "आत्महत्या"  का एकांतिक पथ दिखाती है   संपूर्णानंद मिश्र प्रयागराज फूलपुर 7458994874

कली आज ढल गई

वह सुंदर कली थी   भ्रमर मंडराते थे   उस पर कभी रसपान करते हुए  हजारों वादे निभाने की   कसम खाते थे    उत्कंठित थे  एक झलक पाने की   अवगुंठन हटाने के लिए   ज़िंदगी भी दांव पर लगाते थे       मौत भी हुस्न के  बाज़ार में सस्ती बिक जाती थी     इस प्रतिस्पर्धा में      आम आदमी तो  वृंत-स्पर्श में ही सुख पाते थे    परिपक्व कली तक  सभी मधुकर नहीं पहुंच पाते थे       फिर भी उसने  कभी निराश नहीं किया अपने चाहने वालों को    दोनों हाथ अर्क  अपने प्रेमियों को लुटाती थी    आज हुस्न  उसकाढल गया   मौत भी ज़िंदगी से    फिर महंगी हो गई  ‌   डालियों को छोड़कर       कुछ भौंरे तोताचश्म हो गए      इश्क की दरिया में एक भ्रमर       अब भी अपना        नेह लुटा रहा था          सबसे बड़ा प्रेमी अपने को   ...