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उपन्यास के दु:खद पृष्ठों में

 आज का किसान  रिहा हो गया है  प्रेमचंद के गोदान से नहीं पुनः कैद होना चाहता है  कहानी और उपन्यास  के दुख़द पृष्ठों में    होरी और घीसू को  अरसे से बरगलाया गया  कफ़न के नाम पर अनवरत गालियां दी गयीं पसीना बहाकर भी  वह सतत सहलाता ही रहा पेट को। निरंतर मृत्यु की भट्ठी में  असह्य प्रसव वेदना से छटपटाती  बुधिया के जीवन की कुर्बानी से वर्षों तलवे सहलाता आया  किसान अब अनभिज्ञ नहीं  है  पूंजीवाद की भाषा  खूब समझता है अब वह  इसलिए सड़क पर  डटकर खड़ा है  पक्ष और विपक्ष को खूब अब तड़ा है  वह जानता है  इस बात को मानता है कि सब एक ही हैं  स्वार्थ की रोटियां दोनों सेंक रहे हैं सियासी आग की भट्ठी में  मुझ होरी और घीसू को  एक बार फिर झोंक रहे हैं  डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र प्रयागराज फूलपुर 7458994874

फल

वृहद सुख की कामना  मन में  लिए घूम रहा है मनुष्य इधर- उधर उस मृग की तरह  छद्माभास जिसे होता है अनवरत  छद्माभास  एक गंभीर रोग है नज़र का  जिसके ताने- बाने को    सत्ता और संपत्ति ने ही बुना है  निरंतर सिलता है  सत्ता और संपत्ति  अहंकार के ही परिधान को   भटक रहा है सदियों से इंसान इसीलिए इसे धारण कर  नरक का पथ निर्मित होता है अहंकार से  क्योंकि इस दोष से नहीं बच सके  हैं बड़े- बड़े संन्यासी  इसीलिए नहीं चख सके  समता के फल के स्वाद को      क्योंकि  समता के फल का स्वाद  मिलता है उन्हीं को   जिन्होंने अहंकार के  वृहदाकार खोह को   प्यार  की मिट्टी से पाटा हो  देश के कुछ संतों ने पाटा था इसे   चख सके इसीलिए  समता के फल के मीठे स्वाद को वे डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र प्रयागराज फूलपुर 7458994874

क्या सब कुछ बदल जायेगा

  अपने गर्भ में  तारीख महीनों को पाल रहा  कैलेंडर जनेगा  एक और नया साल जिसकी रेखा की बुनियाद पर   भविष्यवक्ताओं का  भविष्य टिका है  तो क्या यह मान लिया जाय  यह बदलाव का वर्ष होगा सब कुछ बदल जायेगा  दिलों पर लगा  ज़ख्म सूख जायेगा जो उग आया है  नागफनी की तरह  जिसने सीखा है पनपना   विश्वास है विस्तार में जिसका नहीं उसने सीखा  संसर्ग में रहकर भी  चिरकाल तक  दौड़ता रहा अंधी दौड़  हर बार हारता रहा  बावजूद उसे कुचलता रहा  उसे परम विश्वास था  इस बात का छद्म एहसास था कि नहीं हो सकता  वह मेरा प्रतिस्पर्धी       क्योंकि  इस कंगूरे की चमक  के लिए कितनी मांगों  का सिंदूर मैंने पिया है  और कितनी सिसकियों   की सीढ़ियों पर चढ़कर  अवस्थित हूं आज मैं  वह निरीह लाचार  कमठ क्या जाने  यह सब कुछ एक अंतहीन प्रश्न  नववर्ष के जश्न में  आकंठ और आकर्ण डूबे  लोगों से पूछना चाहता हूं कि क्या सब कुछ बदल जायेगा  दो ...

नए साल के नए दौर पर - कवियित्री अंजु परिहार

नए साल के नए दौर पर  कुछ अच्छी आदत सीखना तुम औरों को खुश रखना और हँसते हुए रहना तुम  नए साल के नए दौर पर नई पहचान बनाना तुम  पहचान येसी जो भा जाए मन को  ये सवेरा लाना तुम  नए साल के नए दौर पर  संग रौशनी लाना तुम  नए साल की नई कहानी  खुद अपनी बनाना तुम  ..... . अंजु परिहार 

मेरी माँ - कवियत्री अंजू परिहार

निराशा में आशा है जीवन में मेरी सूरज की पहली किरण से पहले उठे जो मेरी माँ, हर पल हर वक्त हर समय मुस्कुराती सी मेरी माँ । न सीमा न अंत है, ऐसा प्रेम मेरी माँ , दिल क्यों वो तो आत्मा पढ़ ले, ऐसी मेरी मााँ, दुःख की छाया उसके आाँचल में, सर रख हो जाती ग़ुम ऐसी मेरी माँ | लोग घूमे मथुरा काशी मेरा चार धाम मेरी माँ करने को मेरे सपने साकार, भूल गई वो अपने सपने, ऐसी मेरी माँ त्याग की देवी ममता की मूरत, सर्वोपरि है रिश्ता हमारा, ऐसी मेरी मााँ|

दीपावली

 दीपावली केवल बाहर रोशनी जलाने का नाम नहीं, बल्कि अंतर को भी प्रज्ज्वलित करने का पर्व है। हमारी चेतना बाहर की ओर देखती है, अगर हम अंदर की ओर देखें तो कायाकल्प हो सकता है। अगर अंदर की रोशनी जल गई तो पूरा जीवन जगमग जगमग हो जाएगा। अपने अंतर में दीया जलाने की प्रक्रिया को ही ध्यान कहते हैं। आपका पूरा जीवन जगमग जगमग हो ऐसी शुभकामनाएं । हमारी चेतना बाहर की तरफ देखती है। यह कुछ स्वाभाविक है। बच्चा पैदा होता है तो स्वाभाविक है कि पहले बाहर देखे। जैसे ही बच्चे का जन्म होता है तो वह आंख खोलेगा, बाहर का संसार दिखाई पड़ेगा। कान खुलेंगे, बाहर की ध्वनियां सुनाई पड़ेंगी। हाथ फैलाएगा, मां को छुएगा, स्पर्श करेगा, बाहर की यात्रा शुरू हो गई। फिर प्रतिपल की जरूरतें हैं। बच्चे को भूख लगेगी तो रोएगा। भूख भीतर तो भर नहीं सकती। बाहर से भरनी पड़ेगी। प्यास लगेगी तो रोएगा। पानी तो बाहर से मांगना पड़ेगा। भीतर तो कोई जल के स्रोत नहीं हैं। बाहर में धीरे-धीरे निमज्जित होता जाएगा। धीरे-धीरे बाहर ही सब कुछ हो जाएगा। भीतर की याद ही न आएगी। तुम भूल ही जाओगे कि तुम भी हो। दो फकीर रास्ते से गुजरते थे। अचानक एक फकीर ने कहा...

मोह - एक मनोवैज्ञानिक सत्य

    बाधक होता है मोह लक्ष्य में अपने को ही पहचानता है केवल       अपनी ही  जय-जयकार करवाता है छल लेता है कांपती एवं लड़खड़ाती आवाज़ों को  थोड़ा और खुलकर कहा जाय  तो नष्ट हो जाती है  प्रज्ञा ऐसे व्यक्ति की नहीं भेद कर पाता है  सत्य और असत्य में  पाप और पुण्य में  देशभक्ति और देशद्रोह में न्याय और अन्याय में  रात और दिन में  सूर्य और चांद में  अंधेरे और उजाले में  नीर और क्षीर में   फंस जाता है मोही व्यक्ति अपने ही बनाए चक्रव्यूह में  जहां से उसका निकलना असंभव हो जाता है  कह सकता हूं  खुलकर दूसरे शब्दों में  कोई खास अंतर नहीं है मोहग्रस्तता और अंधेपन में  दोनों का पथ एक हो जाता है  मोहग्रस्तता से युक्त जब अंधा  व्यक्ति बैठकर  सत्ता के मचान पर   न्याय करने लगे  तब यह समझ लेना चाहिए कि  महाभारत होना तय है      चाहे वह  परिवार हो या देश हो  क्योंकि जब मुखिया  अंधा और मोही दोनों हो जाय  तब कोई नहीं  बचा सकता है एक और...