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रक्त- चरित्र


कोई चरित्र नहीं 
कोई मित्र नहीं 
कोई रहम नहीं 
सब बहम ही बहम
पाल लेती है 
पालघर में
साधुओं को चोर समझकर 
मौत के घाट उतार देती है 
भीड़ अंधी होती है 
भीड़ बहरी होती है 
सिर्फ अपनी ही सुनती है 
अपनी ही गुनती है 
भीड़ बड़ी ताकतवर होती है
रक्त- चरित्र के विकास हेतु
दस- बीस पुलिस भी
खड़ी कर लेती है 
क्रोधाग्नि में जलती रहती है
किसी भूलवश संस‌र्ग में 
आए हुए को राह नहीं दिखाती बल्कि अपनी लपट
से झुलसा देती है 
मौत की नींद सदा सुला देती है
और अपने रक्त- चरित्र को 
सशक्त बनाती है 
क्योंकि
भीड़ का कोई चरित्र नहीं 
भीड़ का कोई मित्र नहीं 
भीड़ किसी पर रहम 
नहीं करती है !

रचनाकार- डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र
7458994874
mishrasampurna906@gmail.com

Comments

  1. सम्पूर्णानंद जी वास्तव में एक सच्चे इतिहास निर्माता कवि हैं। कवि की कविताएं कोरोना काल के एक- एक घटना क्रम की साक्षी हैं। भावी पीढ़ी के लिए कोरोना काल के बारे में जानने, महसूस करने एवं अनुसंधान करने में सम्पूर्णनंद जी की कोरोना कालीन कविता - संग्रह निश्चित ही बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।👍👌👌

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  2. सम्पूर्णानंद जी वास्तव में एक सच्चे इतिहास निर्माता कवि हैं। कवि की कविताएं कोरोना काल के एक- एक घटना क्रम की साक्षी हैं। भावी पीढ़ी के लिए कोरोना काल के बारे में जानने, महसूस करने एवं अनुसंधान करने में सम्पूर्णनंद जी की कोरोना कालीन कविता - संग्रह निश्चित ही बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।👍👌👌

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