Skip to main content

मौन

मैं मौन था
वह कौन था
चिंतन की मुद्रा में
बैठा मुझे
विचारों के
मकड़जाल में
फंसाया था
जब भी मैं
विश्वास की डोर को
मन के मजबूत
 खूंटे में
बांधा हूं
तब- तब उसने
मन‌ के खूंटे ‌को
तोड़ाया है
उस कौन से
     "मैं"
निरंतर संघर्षरत हूं
उसको आज
 मैं रंगेहाथ
पकड़ना चाहता हूं
दो- दो हाथ
 करना चाहता हूं
चारों तरफ़ पहरा
 लगा दिया हूं 
अब वह बचकर
नहीं जा सकता
मुझे अब नहीं
वह बांध सकता
सारी लीला उसकी
समझ गया हूं ‌
  उससे
जद्दोजहद करते- करते
अब मैं जीत के पथ
पर ‌बढ़ चुका हूं
मैं मौन था
वह कौन था
अब उसे अच्छी तरह
समझ चुका हूं।।
डॉ सम्पूर्णानंद मिश्र जी की अन्य कविताएं पढ़ें

Comments

Post a Comment