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Good Morning

प्रेम बिलकुल अनूठी बात है, 
उसका बुद्धि से कोई सम्बन्ध नहीं। 
प्रेम का विचार से कोई संबंध नहीं। 
जैसा ध्यान निर्विचार है, 
वैसा ही प्रेम निर्विचार है। 

जब किसी दूसरे व्यक्ति के संपर्क में ध्यान घटता है, 
तो हम उसे प्रेम कहते हैं। 
और जब बिना किसी दूसरे व्यक्ति के, 
अकेले ही प्रेम घट जाता है, 
तो उसे हम ध्यान कहते हैं। 
जैसे एक ही दरवाजे पर बाहर से लिखा होता है एंट्रेन्स, 
और भीतर से लिखा होता है एग्जिट। 
अगर बाहर से उस दरवाजे पर पहुँचे, 
तो लिखा है प्रेम। 
अगर भीतर से उस दरवाजे को अनुभव किया 
तो लिखा है ध्यान। 
ध्यान अकेले में ही प्रेम से भर जाने का नाम है 
और प्रेम दूसरों के साथ ध्यान में उतर जाने की कला है।

शुभ प्रभात...!

Comments

  1. कितना सही कहे है आप।कुछ बात अलग है मेरी,।मेरे लिए ध्यान ईश्वर का ही है,जो मुझे असीम आनंद देता है,चेहरे पर ग्लो देता है,ऊर्जावान रखता है,प्रेम तो मै अपनी बिल्ली से भी करती हूँ पर कई बार दुखी भी हो जाती हूँ।ध्यान और प्रेम अलग है,एक निर्विकार तो दूसरा स्वार्थ से भरा।मेरे लिए ध्यान अपने खुद से प्रेम है।जो मन में आया लिखा है,क्षमा चाहते है।

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    Replies
    1. आपने जो भी लिखा आपकी अनुभूति है जो स्वागत योग्य है । स्वानुभूति ही है जो महत्वपूर्ण है बाकी सब तो बातें हैं और बातों का क्या। क्षमा मांगकर शर्मिंदा न करें । आपका बहुत आदर करता हूँ ।

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    2. I know that sir,that's why I express my views,my experiences so boldly.thank u sir choton ko pyar,mam aur aap ko shubhaashish

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  2. बहुत सुंदर सर

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