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पिता


पिता फ्रेम में कैद फोटो 
 जैसे अब कुछ-कुछ हो गए
  धूल खाए हुए 
  वक्त की मार सहे हुए 
 भीतर से रोज-रोज मरते हुए 
 अभिशाप की निरंतर
    पीड़ा पीते हुए
   छद्म  हंसी हंसते हुए
   बिल्कुल सेट हो गए फ्रेम में
    त्योहार आने पर 
‌    खिलखिला उठते हैं 
 फ्रेम में ही उठने- बैठने लगते हैं
 खुशियां समेट नहीं ‌पाते 
     चेहरे पर पड़ी 
धूल की आज निर्मम पिटाई होगी
  रोज़ मुंह बिराती थी 
उछल- उछल जाती थी 
अपना रंग-रूप दिखाती थी 
अपने को इंद्राणी बताती थी
  जोर- जोर से 
गर्दभ स्वर में गाती थी 
किटी पार्टी मनाती थी 
मुझे जूठन खिलाती थी
  अपने संघातियों
 को बुलाती थी
 प्रेम से कभी दो बोल
 भी नहीं बोलती थी
 मेरी अनुपयोगिता की खिल्ली
    भी उड़ाती थी
   फ्रेम की दुनिया से
    रिहाई होने पर 
    पिता की खुशी 
मुहल्ले में भी सुनाई पड़ जाती है 
    हांलांकि यह
अस्थायी रिहाई भी किसी को इतनी प्रसन्नता दे सकती है
  आज मैंने पिता
 की आंखों में देखा है
  झांका है, ताका है, निहारा है
  मुहल्ले के हर
 घरों में फोटो में क़ैद
 बुज़ुर्ग पिताओं की
 आंखें चमक उठीं 
 इसको उन लोगों ने 
 अनुपयोगी पिताओं का
 आंदोलन माना 
  और यह जाना कि 
  आज कल्लू के
 पिता की रिहाई हो रही है
  तो कल हम भी रिहा हो जायेंगे!

संपूर्णानंद मिश्र
प्रयागराज फूलपुर
7458994874

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