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क्या है आत्मविश्वास ? क्या हम सही समझते हैं?

आत्मविश्वास
हम जब भी जीवन का गहराई से विचार करते है
 समस्याओं और संकटों का मूल कारण ढूंढने का प्रयास करते हैं
बार-बार एक निष्कर्ष एक नतीजा सामने आता है
हमारी अधिकतर समस्याओं का कारण है आत्मविश्वास का ना होना
ईर्ष्या भी वहीं से जन्म लेती है, क्रोध भी,  आलस्य भी और लालसा भी
आत्मविश्वास ही जीवन में सुख और सफलता प्राप्त करने की चाबी है
किंतु क्या हम आत्मविश्वास का अर्थ समझते हैं?
कोई भी कार्य जब हमारे समक्ष आता है तो हम निश्चय करते हैं कि इस कार्य में हम अवश्य सफल होंगे
क्या यह आत्मविश्वास है?
हमारे सिवा अन्य कोई सफल हो ही नहीं सकता, ऐसा भी हम मान लेते हैं
क्या यह आत्मविश्वास है?
आत्मविश्वास क्या अहंकार का ही रूप है?
किंतु अहंकार तो सदा संघर्ष को जन्म देता है
तो क्या आत्मविश्वास संघर्ष का कारण है?
जब हम मानते हैं कि हम अवश्य सफल होंगे तो हम उसे आत्मविश्वास कहते हैं
किस आधार पर कहते हैं कि हम सफल होंगे?
हमारे अनुभव के आधार पर अथवा प्राप्त किए हुए ज्ञान के आधार पर
किंतु अनुभव तो बीते हुए कल का सत्य है
आने वाले समय में वह सत्य सिद्ध हो यह आवश्यक नहीं
ज्ञान की तो कोई सीमा ही नहीं
कैसे मान लें कि जितना भी आवश्यक है वह सारा ज्ञान हमने पाया लिया है
अर्थात आत्मविश्वास का आधार अनुभव या ज्ञान है तो वह आधार मिथ्या है
 आत्मविश्वास का आधार यह भी नहीं हो सकता कि दूसरों के पास शक्ति कम है 
हम सबसे अधिक शक्तिमान है ये अहंकार है
और अहंकार तो अवश्य ही टूटता है
संसार ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि हम से अधिक शक्तिमान व्यक्ति आते ही रहते हैं
तो आत्मविश्वास का मूल रूप क्या है
 आत्म यानि स्वयं जब हम स्वयं पर विश्वास करते हैं तो उसे आत्मविश्वास कहते हैं5
किंतु प्रश्न यह है क्या हम स्वयं को जानते हैं
कितनी बार हमने ऐसा कुछ कहा है जो हमें नहीं कहना चाहिए था
कितनी बार हमने बिना परिणाम का विचार किए क्रोध किया है
कितनी बार ऐसा हुआ है जिसे कल मित्र मानते थे आज शत्रु दिखाई देता है
अगर हम वास्तव में स्वयं को जानते हैं तो हमारे निर्णय बदल क्यों जाते हैं
तो क्या है आत्मविश्वास
प्रतिदिन आईने में मुख देखते हैं वह हमारा है
किंतु उस मुख के पीछे जो मन है उसका हमें कोई परिचय नहीं
 गहराई से विचार करेंगे तो तुरंत जान पाएंगे कि आप दूसरों की दी हुई धारणाओं का मेल मात्र ही हैं
 हम सदैव ऐसे ही जीते हैं और वैसे ही सोचते हैं जैसा समाज ने हमें सिखाया है
हमें वास्तव में स्वयं के विचारों का परिचय ही नहीं
आत्म अर्थात स्वयं को हम जानते ही नहीं
 यही कारण है कि हमारे पास अहंकार तो है पर आत्मविश्वास नहीं
वास्तव में आत्मविश्वास और कुछ भी नहीं
 स्वयं का अपने मन और बुद्धि से परिचय करने का नाम है

Comments

  1. मैं कर सकता हूं।
    मैं ही कर सकता हूं।
    जिसने इन वाक्यों के अंतर को आत्मसात कर लिया उसने आत्मविश्वास और अहंकार के मतलब को भी समझ लिया।

    ReplyDelete

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