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यह कैसी विडंबना


  ‌ विदेशों में थे 
  ‌     जो
    प्रवासी थे 
    भारतीय थे
 अपनी भूमि से प्रेम नहीं 
  भाषा से लगाव नहीं 
  धर्म के प्रति आस्था नहीं 
  आस्तिकता का चोला 
    उतार फेंके थे 
   हिकारत से देखते थे
   यहां की संस्कृति को 
   अनासक्ति थी माता- पिता में 
     वतनपरस्त नहीं थे 
  नमक हलाली नहीं थी
    जिसके जिस्म में 
     एक वायरस
  ने घुटनों पर ला दिया 
   अपनी मिट्टी के 
मोल का ज्ञान करा दिया
  जिस पुष्पक विमान 
  पर उड़ कर चांद को 
  धरा पर लाने गए थे 
 आज औंधे मुंह गिर गए 
   गाफ़िल हो गए थे 
    अंधे और बहरे हो गए थे
न सुन सकते थे न देख सकते थे
   केवल भाग रहे थे 
  दिन- रात जाग रहे थे 
   न जाने क्या -क्या 
    करना चाहते थे !
 सूरज पर हमला करने के लिए
   नानायुध तैयार कर रहे थे 
   आज महि- समर में चित्त पड़े हैं
     लेकिन हमारी 
 संस्कृति उदारवादी रही है
   मानवतावादी रही है 
   अर्थवाद के चक्रव्यूह
     में नहीं फंसी कभी 
  अभिमन्यु- शास्त्र से प्रेरित रही है 
          वह‌ जानती थी 
     प्रकृति के बदलते हुए रंग-रूप
     को भली-भांति पहचानती थी
      सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है
        आज वैश्विक निराशा 
        के मेघ छाए हुए हैं
        सब भारत की ओर मुंह        
करके ताक रहे हैं
         कोई दवा बनी !
       इस जिज्ञासा से निरन्तर ‌झांक रहे हैं 
बहिर्गमित हुए प्रवासी वहां     
बिलबिला रहे थे 
 भारत- भारत कहकर 
     चिल्ला रहे थे 
     आज सरकार की 
     प्रशंसा होनी चाहिए
     कि उन्हें वहां से लायी 
     बस साहब दुःख एक ही है 
     उनका क्या कसूर है
जो भारत- निर्माण में गए थे 
कुशल देवशिल्पी कहलाते थे
आज रेल की पटरियों
     पर क्यों सोए हैं !

 संपूर्णानंद मिश्र
7458994874
mishrasampurna906@gmail.com

Comments

  1. True..Plightful condition of migrant workers..the worst sufferers

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