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शहर जल रहा है

यह कैसी दरिंदगी है 
अमनचोरों की
कैसी पसंदगी है !
शांति फ़रोशी का धंधा
क्यों कर रहे हो ?
धर्म के नाम पर इतने 
अंधा क्यों हो रहे हो ?
गांधी ‌की कुर्बानी भी 
याद आती नहीं तुम्हें 
किसी मां से उसका लाल
छीनने का क्या अधिकार है ?
किसी पत्नी की मांगों में पड़ी सिंदुर को क्यों पोंछ रहे हो 
इस भारत मां का
गला क्यों घोंट रहे हो 
तुम्हारी ज़िन्दगी को धिक्कार है
तुम्हारी इस करतूतों
पर राष्ट्र भी शर्मशार है
देश‌ किस दिशा में ‌
   जा रहा है 
क्या इसका भान है!
या तुम्हारा यह कोई 
मिथ्या सा अभिमान है
अपने आक्रोश की अग्नि 
से शहर क्यों जला रहे हो?
जलियांवाला बाग हत्या काण्ड 
की क्यों याद दिला रहे हो
ये चंद गद्दारों का ही ‌काम है 
अपने क्षणिक स्वार्थ के लिए
राजनैतिक रोटियां सेंक रहे हैं 
अपने-अपने नफ़रतों का 
सियासी बीज बो रहे हैं 
जयचंदों सावधान हो जाओ!
देश के दो फांक नहीं होने देंगे 
अगर अब नहीं चेते तो 
लहू का हिसाब 
 लहू से ही लेंगे।

रचनाकार - डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र

Comments

  1. दिल छु लिया इस कविता ने।लगा कहीं हम अंग्रेजों.के अधीन तो नहीं है।

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