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श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा-अध्ययन

श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा
डॉ०  भीमराव अंबेडकर

सारांश – इस पाठ  में लेखक ने जातिवाद के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को सभ्य समाज के लिए हानिकारक बताया है | जाति आधारित श्रम विभाजन को अस्वाभाविक और मानवता विरोधी बताया गया है। यह सामाजिक भेदभाव को बढ़ाता है। जातिप्रथा आधारित श्रम विभाजन में व्यक्ति की रुचि को महत्त्व नहीं दिया जाता फलस्वरूप विवशता के साथ अपनाए  गए  पेशे में  कार्य-कुशलता नहीं आ पाती | लापरवाही से किए गए कार्य में गुणवत्ता नहीं आ पाती और आर्थिक विकास बुरी तरह प्रभावित होता है| आदर्श समाज की नींव समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर टिकी होती है। समाज के सभी सदस्यों से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करने के लिए सबको अपनी क्षमता को विकसित करने  तथा  रुचि के अनुरूप व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए|  राजनीतिज्ञ को अपने व्यवहार में एक व्यवहार्य सिद्धांत की आवश्यकता रहती है और यह व्यवहार्य सिद्धांत यही होता है कि सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए।

प्रश्न1-डॉ० भीमराव अंबेडकर जातिप्रथा को श्रम-विभाजन का ही रूप क्यों नहीं मानते हैं ?
उत्तर –
 १- क्योंकि यह विभाजन अस्वाभाविक है |
२- यह मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है |
३- व्यक्ति की क्षमताओं की उपेक्षा की जाती है |
४- व्यक्ति के जन्म से पहले ही उसका पेशा निर्धारित कर दिया जाता है |
५- व्यक्ति को अपना व्यवसाय बदलने की अनुमति नहीं देती |
प्रश्न२- दासता की व्यापक परिभाषा दीजिए |
उत्तर – दासता केवल कानूनी पराधीनता नहीं है|  सामाजिक दासता की स्थिति में कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा तय किए गए व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने को विवश होना पड़ता है | अपनी इच्छा के विरुद्ध पैतृक पेशे अपनाने पड़ते हैं |
प्रश्न३- मनुष्य की क्षमता किन बातों पर निर्भर रहती है ?
उत्तर –मनुष्य की क्षमता मुख्यत: तीन बातों पर निर्भर रहती है-
१-      शारीरिक वंश परंपरा
२-      सामाजिक उत्तराधिकार
३-      मनुष्य के अपने प्रयत्न
लेखक का मत है कि शारीरिक वंश परंपरा तथा सामाजिक उत्तराधिकार किसी के वश में नहीं है परन्तु  मनुष्य के अपने प्रयत्न उसके अपने वश में है | अत: मनुष्य की मुख्य क्षमता- उसके अपने प्रयत्नों को बढ़ावा  मिलना चाहिए |
प्रश्न४- समता का आशय स्पष्ट करते हुए बताइए कि राजनीतिज्ञ पुरूष के संदर्भ में समता को कैसे स्पष्ट किया गया है ?
जाति, धर्म, संप्रदाय से ऊपर उठकर मानवता अर्थात् मानव मात्र के प्रति समान व्यवहार ही समता है। राजनेता के पास असंख्य लोग आते हैं, उसके पास पर्याप्त जानकारी नहीं होती सबकी सामाजिक पृष्ठभूमि क्षमताएँ, आवश्यकताएँ जान पाना उसके लिए संभव नहीं होता अतः उसे समता और मानवता के आधार पर व्यवहार के प्रयास करने चाहिए ।
गद्यांश-आधारित अर्थग्रहण संबंधित प्रश्नोत्तर
गद्यांश संकेत-पाठ श्रम विभाजन और जाति प्रथा (पृष्ठ १५३)
यह विडम्बना.......................................................................................................................बना देती है |
प्रश्न १-श्रम बिभाजन किसे कहते हैं ?
उत्तर: श्रम विभाजन का अर्थ है– मानवोपयोगी कार्यों का वर्गीकरण करना| प्रत्येक कार्य को कुशलता से करने के लिए योग्यता के अनुसार विभिन्न कामों को आपस में बाँट लेना | कर्म और मानव-क्षमता पर आधारित यह विभाजन सभ्य समाज के लिए आवश्यक है |
प्रश्न २ - श्रम विभाजन और श्रमिक-विभाजन का अंतर स्पष्ट कीजिए |
उत्तर- श्रम विभाजन में क्षमता और कार्य-कुशलता के आधार पर काम का बँटवारा होता है, जबकि श्रमिक विभाजन में लोगों को जन्म के आधार पर बाँटकर पैतृक पेशे को अपनाने के लिए बाध्य किया जाता है| श्रम-विभाजन में व्यक्ति अपनी रुचि के अनुरूप व्यवसाय का चयन करता है | श्रमिक-विभाजन में व्यवसाय का चयन और व्यवसाय-परिवर्तन की भी अनुमति नहीं होती, जिससे समाज में ऊँच नीच का भेदभाव पैदा करता है, यह अस्वाभाविक  विभाजन है |
प्रश्न ३ –लेखक ने किस बात को विडम्बना कहा है ?
उत्तर : लेखक कहते हैं कि आज के वैज्ञानिक युग में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो जातिवाद का  समर्थन करते हैं और उसको सभ्य समाज के लिए उचित मानकर उसका पोषण करते हैं| यह बात आधुनिक सभ्य और लोकतान्त्रिक समाज के लिए विडम्बना है |
प्रश्न ४ : भारत में ऎसी कौन-सी व्यवस्था है जो पूरे विश्व में और कहीं नहीं  है ?
उत्तर: लेखक के अनुसार जन्म के आधार पर किसी का पेशा तय कर देना, जीवनभर एक ही पेशे से बँधे रहना, जाति  के आधार पर ऊँच-नीच का भेदभाव करना तथा बेरोजगारी तथा भुखमरी की स्थिति में भी पेशा बदलने की अनुमति न होना  ऐसी व्यवस्था है जो विश्व में कहीं नहीं  है |

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