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भारतीय गायिकाओं मे बेजोड़ - लता मंगेशकर

पाठ-1 भारतीय गायिकाओं मे बेजोड़ - लता मंगेशकर

महत्त्वपूर्ण लघूत्त्रात्मक प्रश्नः-
प्र.1ः लेखक को लताजी की आवाज़ के जादू का परिचय कब व कैसे हुआ ?
उ.- वर्षों पूर्व, जब लेखक ने अपनी बीमारी के दौरान रेडियो खोला तो लताजी द्वारा गया हुआ गाना सुना व गाने के अंत में गायिका का नाम घोषित हुआ-लता मंगेशकर। यही उनका प्रथम परोक्ष परिचय था।

प्र.2ः लताजी के गायन की किन विशेषताओं की ओर लेखक ने ध्यान आकर्षित किया है ?
उ.- लताजी के गायन की निम्नांकित विशेषताओं की ओर लेखक ने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है-
1. गानपन व सुरीलापन - वह मिठास जो श्रोता को मस्त कर देती है।
2. स्वरों की निर्मलता, कोमलता व मुग्धता
3. नादमय उच्चार - गीत के किन्हीं दो शब्दों का अंतर स्वरों के आलाप द्वारा सुंदर रीति से भर देना, जिससे वे दोनों शब्द विलीन होते-होते एक दूसरे में मिल जाते हैं।
4. उच्चारण की शुद्धता।
5. भावानुकूल आरोह अवरोह।

प्र.3ः लता की गायकी का समाज पर क्या प्रभाव पड़ा है ?
उ.- लता की गायकी ने लोगों में संगीत के प्रति रुझान विकसित किया है। आम आदमी भी
अब संगीत की सूक्ष्मता को समझने लगा है। आज के बच्चों के गले पहले की तुलना में अधिक
सधे हुए व अधिक सुरीले हैं। संगीत के विविध प्रकारों से उनका परिचय बढ़ा है।

निबंधात्मक प्रश्न :
प्र.1ः चित्रपट संगीत व शास्त्रीय संगीत में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उ.- चित्रपट संगीत में प्रयोगधर्मिता है। ये संगीतकार जहाँ शास्त्रीय संगीत की रागदानी को अपनाते है, वहीं लोक संगीत की अपार विपुल सामग्री का भी बेझिझक उपयोग अपने चित्रपट संगीत में करते हैं। उसमें लचकता होती है। इसमें प्रायः आधे तालों का प्रयोग होता है। दु्रतलय व चपलता इसका प्रमुख गुणधर्म है। शास्त्रीय संगीत में गम्भीरता अपेक्षित होती है। उसमें ताल अपने परिष्कृत रूप में प्रयुक्त होता है। शास्त्रीय संगीतकार आत्मसंतुष्ट वृत्ति के हैं, वे नए प्रयोगों में रुचि नहीं दिखाते, बल्कि कर्मकाण्ड को आवश्यकता से अधिक महत्त्व देते हैं।
शास्त्रीय संगीत का आनन्द लेने के लिए श्रोता के पास कम से कम घण्टा-आधा घण्टा का समय होना चाहिए, जबकि चित्रपट संगीत दो तीन मिनट में ही श्रोता को भाव विभोर कर सकता है ।

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